खुद को भविष्य का सुपरपावर मानने वाले चीन का हाल देखें तो उसके विकास की चमत इन दिनों अंधेरे में डूबी हुई है। क्योंकि चीन में बिजली संकंट की वजह से पहले फैक्ट्रियों में काम-काज ठप्प हुआ। फिर लाखों करोड़ों घरों में लोग बिजली न आने से परेशान हो गए। इसका सबसे ज्यादा असर चीन के उत्तर और पूर्व के शहरों पर परा। बिजली संकट ने चीन की अर्थव्यस्था को बड़ा झटका दिया है। वहीं, रियल एस्टेट में मंदी भी चीन पर भारी पड़ी है। सितंबर 2021 में खत्म तिमाही में चीन की जीडीपी ग्रोथ की रफ्तार 4.9 फीसद पर आ गई है। विश्लेषकों की ओर से चीन को कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने की योजनाओं को अलग रखना पड़ सकता है। अपने बिगड़ते बिजली संकट से निपटने के लिए। चीन अब विदेशों में कोयले से चलने वाले नए बिजली संयंत्र स्थापित नहीं करेगा। अब वह ऐसी योजनाओं में निवेश करना चाहता है जिसमें कम से कम कार्बन का उत्सर्जन हो।

चीन में कोयला की कीमत तीन गुना बढ़ी

चीन में एक टन कोयला की कीमत 1,640 युआन (19172 रुपये) तक पहुंच गई है। कोयला की कीमत तय करने वाली झेंग्झौ थर्मल कोल फ्यूचर्स ने बुधवार को हुए कारोबार में 1,640 युआन के आंकड़े को छुआ है। अब चीनी बिजली कंपनियां कोयला की कीमत में उतार-चढ़ाव और बाजार में मांग के हिसाब से बिजली की कीमत तय कर सकेंगी। जाहिर तौर पर इसका सबसे बड़ा नुकसान चीन के आम नागरिकों को होगा।

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हरित एवं निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था

पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हरित सुधार और विकास को हासिल करते हुए, एक हरित और निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर तेज़ी से बदलाव की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने संकल्प लिया, “चीन, 2030 से पहले तत्परता से कार्बन डायऑक्साइड उत्सर्जन कम करने के प्रयास करेगा और 2060 से पहले ही कार्बन तटस्थता हासिल करेगा। उन्होंने कहा कि चीन अन्य विकासशील देशों को हरित व निम्न-कार्बन ऊर्जा विकसित करने में भी सहयोग देगा, और विदेशों में कोयले से चलने वाली नई बिजली परियोजनाओं का निर्माण बन्द करेगा। 

कई तरह की शंकाएं बनी हुई

चीन की इस घोषणा के बाद से अभी भी कई तरह की शंकाएं बनी हुई हैं। जैसे, चीन कोयला संयंत्रों का वित्तपोषण कब से बंद करेगा, सिर्फ सरकारें ऐसा करेंगी या निजी क्षेत्र के जरिए भी किसी तरह की सहायता उपलब्ध नहीं कराई जाएगी, क्या इससे मौजूदा संयंत्र प्रभावित होंगे आदि।

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